(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

महाभारत का अरयण्क पर्व – Mahabharat Aranyak Parv in Hindi


॥ श्रीः ॥
3.243. अध्यायः 243
Mahabharata - Vana Parva - Chapter Topics
चित्ररथेन रणे पराजितस्य दुर्योधनस्य बन्धनपूर्वकं स्वरथारोपणम् ॥ 1 ॥ इतरैर्गन्धर्वैर्दुर्योधनभ्रतॄणां तद्दाराणां वन्धनम् ॥ 2 ॥ दुर्योधनामात्यादिभिर्युधिष्ठिराय तन्निवेदने भीमेन तदनुमोदनम् ॥ 3 ॥
Mahabharata - Vana Parva - Chapter Text

वैशम्पायन उवाच। 3-243-0x(2597)(25433)
गन्धर्वैस्तु महाराज भग्ने कर्णे महारथे।
संप्राद्रवच्चमूः सर्वा धार्तराष्ट्रस्य पश्यतः ॥ 3-243-1(25434)
तान्दृष्ट्वा द्रवतः सर्वान्धार्तराष्ट्रान्पराङ्मुखान्।
दुर्योधनो महाराजो नासीत्तत्र पराङ्मुखः ॥ 3-243-2(25435)
तामापतन्तीं संप्रेक्ष्य गन्धर्वाणां महाचमूम्।
महता शरवर्षेण सोऽभ्यवर्षदरिंदमः ॥ 3-243-3(25436)
अचिन्त्य शरवर्षं तु गन्धर्वास्तस्य तं रथम्।
दुर्योधनं जिघांसन्तः समन्तात्पर्यवारयन् ॥ 3-243-4(25437)
युगमीषां वरूथं च तथैव ध्वजसारथी।
अश्वांस्त्रिवेणुमक्षं च तिलशो व्यधमञ्छरैः ॥ 3-243-5(25438)
दुर्योधनं चित्रसनो विरथं पतितं भुवि।
अभिद्रुस्य महाबाहुर्जीवग्राहमथाग्रहीत् ॥ 3-243-6(25439)
`तस्य बाहू महाराज बद्ध्वा रज्ज्वा महारथम्।
आरोप्यस महाबाहुश्चित्रसेनो ननाद ह' ॥ 3-243-7(25440)
तस्मिन्गृहीते राजेन्द्र स्थितं दुःशासनं रथे।
पर्यगृह्णन्त गन्धर्वाः परिवार्य समन्ततः ॥ 3-243-8(25441)
विधिशतिं चित्रसेनमादायान्ये विदुद्रुवुः।
विन्दानुविन्दावपरे राजदारांश्च सर्वशः ॥ 3-243-9(25442)
सेनास्तु धार्तराष्ट्रस्य गन्धर्वैः समभिद्रुताः।
पूर्वं प्रभग्नैः सहिताः पाण्डवानभ्ययुस्तदा ॥ 3-243-10(25443)
शकटापणवेशाश्च यानयुग्यं च सर्वशः।
शरणं पाण्डवाञ्जग्मुर्हियमाणे महीपतौ ॥ 3-243-11(25444)
सैनिका ऊचुः। 3-243-12x(2598)
प्रियदर्शी महाबाहो धार्तराष्ट्रो महाबलः।
गन्धर्वैर्ह्रियते राजा पार्थास्तमनुधावत ॥ 3-243-12(25445)
दुःशासनो दुर्विषहो दुर्मुखो दुर्मुखो दुर्जयस्तथा।
बद्ध्वा ह्रियन्ते गन्धर्वै राजदाराश्च सर्वशः ॥ 3-243-13(25446)
इतिदुर्योधनामात्याः क्रोशन्तो राजगृद्धिनः।
आर्ता दीनास्ततः सर्वे युधिष्ठिरमुपागमन् ॥ 3-243-14(25447)
तांस्तथा व्यथितान्दीनान्भिक्षमाणान्युधिष्ठिरम्।
वृद्धान्दुर्योधनामात्यान्भीमसेनोऽभ्यभाषत ॥ 3-243-15(25448)
महता हि प्रयत्नेन संनह्य गजवाजिभिः।
अन्यथा वर्तमानानामर्थो जातोऽयमन्यथा ॥ 3-243-16(25449)
अस्माभिर्यदनुष्ठेयं गन्धर्वैस्तदनुष्ठितम् ॥ 3-243-17(25450)
दुर्मन्त्रितमिदं तावद्राज्ञो दुर्द्यूतदेविनः।
`दीनान्दुर्योधनस्यास्मान्द्रष्टुकामस्य दुर्मतेः' ॥ 3-243-18(25451)
द्वेष्टारमन्ये क्लीवस्य घातयन्तीति नः श्रुतम्।
इदं कृतं नः प्रत्यक्षं गन्धर्वैरतिमानुषम् ॥ 3-243-19(25452)
दिष्ट्या लोके पुमानस्ति कश्चिदस्मन्प्रिये स्थितः।
येनास्माकं हृतो भार आसीनानां सुखावहः ॥ 3-243-20(25453)
शीतवातातपसहांस्तपसा चैव कर्शितान्।
समस्थो विषमस्थान्हि द्रष्टुमिच्छति दुर्मतिः ॥ 3-243-21(25454)
अधर्मचारिणस्तस्य कौरव्यस्य दुरात्मनः।
ये शीलमनुवर्तन्ति ते पश्यन्ति पराभवम् ॥ 3-243-22(25455)
अधर्मो हि कृतस्तेन येनैतदुपलक्षितम्।
अनृशंसास्तु कौन्तेयास्तत्प्रत्यक्षं ब्रवीमि वः ॥ 3-243-23(25456)
एवं ब्रुवाणं कौन्तेयं भीमसेनमपस्वरम्।
न कालः परुषस्यायमिति राजाऽभ्यभाषत ॥ 3-243-24(25457)

इति श्रीमन्महाभारते अरण्यपर्वणि घोषयात्रापर्वणि त्रिचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ 243॥

Mahabharata - Vana Parva - Chapter Footnotes
3-243-6 जीवग्राहं जीवन्तमेव गृहीत्वेति णमुलन्तम्। कषादित्वादग्रहीदित्यनुप्रयोगः ॥ 3-243-18 राज्ञो युधिष्ठिरस्य ॥ 3-243-19 क्लीबस्य अशक्तत्वात् ॥ 3-243-23 येनैतदुपशिक्षितम् इति झ. पाठः ॥ 3-243-24 अपस्वरं क्रोधेन विकलवर्णं यथा स्यात्तथा ब्रुवाणम् ॥


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